“छोटी शिरडी” में श्री साँई बाबा के पूजन की विधि"

गुरूवार को प्रातःकाल या सायंकाल नहा-धोकर स्वच्छ वस्त्रों में भक्त छोटी शिरड़ी में श्री साँई बाबा के समक्ष संष्टांग प्रणाम करें एवं अपनी मनोकामना की सिद्धि हेतु नारियल पूरे विधि विधान के साथ बाँधे। फिर नौ गुरूवारों को छोटी शिरड़ी में 1 मोमबत्ती 2 अगरबत्ती तथा दक्षिण एवं प्रसाद श्री साँई के चरणों में समर्पित करें। मनोकामना पूर्ण होने पर भक्त सपरिवार एवं मित्रों सहित छोटी शिरड़ी में बाबा का भण्ड़ारा करावें।


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साँई सुप्रभातम

उठो उठो शिरड़ी के राजा, उठो उठो साँई नाम।
उठो उठो हे रमावरा, करो जगत कल्याण।।
उठो उठो जगती पते, निद्रा को दो त्याग।
साधु जन द्वारे खड़े, ले दर्शन की बाट।।
जब आप निद्रा में बसो, जगत निद्रावश् होय।
प्रभू की कृपा दृष्टि से, जन जन मंगल होय।।
गोदावरी के तीर पर, पावन शिरड़ी धाम।
तहं समाधि मन्दिर में, हों काँकड़, आरती गान।।
भोले भाले भक्त जन, रहे आरती तार।
घन्टा शंख ध्वनि सहित, कर रहे मंगलाचार।।
हाथ जोड़ विनती करे, चरण कमल धरे माथ।
धूप दीप लोेबान से, नजर उतारें नाथ।।
साँई दास की प्रभाती, साँई करो स्वीकार।
हम सब सेवक है प्रभु, साँई आप सरकार।
नित्य प्रति प्रभात में, जो प्रेम सहित करें गान,
साँई की कृपा होवें, पूर्ण हों सब काम।।
ज्ञान विज्ञान नित नित बढ़े, स्ंवरे सारे काम।
अन्त समय सुख शान्ति से, मिलेगा साँई धाम।।
- सन्त बालकृष्ण दास

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धुनि मइया की आरती


नमों नमों जय धूनि जग माता, कपट हारिणी सब सुख दाता।
उदी प्रदायिनी-मंगल करनी, पाप विनाशिली मोक्ष प्रदाता।।
दुर्गा रूप निरंजनी तू ही, वर प्रदायिनी लक्ष्मी तू ही।
साँई की सच्ची परछायी, भक्तों की तू पिता और माता।।
द्वारिका माँई की ज्वाला मइया, स्कल विश्व की तू प्रनत पाला।
तन-मन-धन की तू रखवाली, मनोवांछित फल देने वाली।।
जो तेरे दर्शन करे-करे चरण स्पर्श। उदी पावन धारण करे, मन उपजे अति हर्ष।।
!!श्री धुनि मईया की जै!!

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श्री साँई चालीसा

जै गणपति जै आदि गणेशा। नाम लेत सब जाय कलेशा।।
जै जै साँई जगदीश्वरा। जै करूणाकर जै ईश्वरा।।
जै जै साँई जगदम्बे। जै दुर्गा जै जै अम्बे।।
जै हो जै हो जग पितु माता। जै जै जै भव सागर त्राता।।
ळरि हर साँई जन हितकारी। जय जय साँई भगत् भयहारी।।
साँई कहत परम सुख होए। साँई कहत जन दूर्मति खोए।।
रसना साँई अमृत पीजै। साँई चरण कमल चित्त दीजै।।
जै जै साँई सद्गुरू दैवा। निशदिन करो साँई की सेवा।।
साई नाथ दया के सागर। सद्गुण निर्गुण परम उजागर।।
साँई नाम की महिमा भारी। जप-जप नाम जन होएं सुखारी।।
कारण करता साँई आप। घट-घट साँई रहयो व्याप।।
साँई शिव शम्भू सर्वेश्वर। साँई परम पिता परमेश्वर।।
साँई आदि पुरूष नारायण। हे मन से करो साँई गुण गायान।।
देवी देव साँई गुण गावैं। साँई महिमा जान न पावैं।।
साँई करूणा के भंडार। साँई महिमा अपरम्पार।।
साँई सर्व सुखों के धाम। साँई कोटी-कोटी परनाम।।
साँई दीजौ भक्ती दान। पल-पल सिमरें तेरो नाम।।
हे साँई हम बालक तेरे। काटे जनम मरण के फेरे।।
सदा ही राखो हमरी लाज। समरथ साँई गरीब निवाज।।
ये चालीसा जानियो, साँई मात की बात।
ऐसो मन में जानकर, सिमरो दिन और रात।।
श्रद्धा से जो भी पढ़े, भाव अर्थ मन लाए।
पूरन साँई दया से, पूरन में मिल जाए।।
छोटी शिरडी आनकर, चरणों में रखे माथ।
नारियल को बांधकर, जोड़ों दोनों हाथ।।
मँागना हो सो माँग ले -खुला साँई दरबार।।
साँई सब कुछ दे रहे, भरले झोली पसार।।

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साँई आरती

आरती श्री साँई गुरूवार की परमानन्द सदा सुरवर की।। आरती।।
जा की कृपा विपुल सुखकारी। दुःख शोक संकट भयहारी।।1।।
शिरडी में अवतार रचाया। चमत्कार से तत्व दिखाया।।2।।
कितने भक्त चरण पर आये। वे सुख शान्ति चिरँ तन पाये।।3।।
भाव धरे जो मन में जैसा। पावत अनुभव वो ही वैसा।।4।।
गुरू की उदी लगावें तन को। समाधान लाभात उस मन को।।5।।
साँई नाम सदा जो गावे। सो फल जग में शाश्वत पावें।।6।।
गुरूवासर करी पुजा सेवा। उस पर कृपा करत गुरूदेवा।।7।।
राम, कृष्ण, हनुमान रूप में। दे दर्शन, जानत जो मन में।।8।।
विविध धर्म के सेवक आते। दर्शन से इच्छित फल पाते।।9।।
जय बोलो साँई बाबा की। जय बोलो अवधूत गुरू की।।10।।
“साँई दास” आरती को गावे। घर में सब सुख मँगल पावें।।11।।

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संत वाणी

जो छोटी शिरड़ी आएगा। आपद दूर भगाएगा।।1।।
चढ़े -मन्दिर की सीढ़ी पर। पैर तले दुख की पीढ़ी पर।।2।।
त्याग शरीर चला जाऊँगा। भक्त-हेतू दौड़ा आऊँगा।।3।।
छोटी शिरड़ी करे पूरी आस। मन में रखना दृढ़ विश्वास।।4।।
साँई को जीवित ही जानो। अनुभव करो सत्य पहचानो।।5।।
जैसा भाव रहा जिस जन का। वैसा रूप हुआ साँई मन का।।6।।
भार तुम्हारा साँई पर होगा। वचन न मेरा झूठा होगा।।7।।
आ सहायता लो भरपूर। जो माँगा वह नहीं है दूर।।8।।
साँई में लीन वचन मन काया। उसका ऋण न कभी चुकाया।।9।।
धन्य-धन्य वह भक्त अनन्य। साँई शरण तज जिसे न अन्य।।10।।

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- सन्त बालकृष्ण दास

श्री साँई कथा

समाज शासित्रयों ने किसी आलौकिक भक्ति के प्रति श्रद्धा व विश्वास को धर्म की परिभाषा के रूप में परिभाषित किया है। लेकिन आज कुछ आलौकिक शक्तियाँ ऐसी है, जिनमें एक नही लाखों की संख्या में जनमानस विश्वास करता है। और इस विश्वास और श्रद्धा को किसी धर्म के रूप में नहीं बांधा जा सकता है। यही कारण है कि ऐसी शक्तियों के सामने सभी सम्प्रदाय के लोग अपना शरीर नवांते है।


कंकरखेड़ा में सरधना रोड स्थित श्री साँई बाबा मन्दिर वर्तमान उत्तर भारत के प्रसिद्ध और चमत्कारी मन्दिरों की श्रेणी में शुमार हो चुका है। मान्यता है कि मन्दिर परिसर में जो भी श्रद्धालु मनोकामना हेतु नारियल बांधता है यह नारियल उस श्रद्धालु की मनोकामना पूर्ण होने पर स्वतः ही टूटकर गिर जाता है। इस परम सिद्धि मंदिर की स्थापना के बारे में जो किंवदन्ती बतायी जाती है वह भी कुछ अनोखी ही है। घटना करीब तीन दशक पूर्व 1979 की है, मन्दिर के संस्थापक बाल कृष्ण दास मित्तल को एक दिन स्वप्न में श्री साँई बाबा ने दर्शन देकर कहा कि - “शिरडी आओ तुम्हारे समस्त दुख दूर हो जायेंगे।” लेकिन इस बात को श्रीमित्तल ने बिसार दिया परन्तु जैसा कि कबीर दास जी ने कहा है -


दुख में सुमिरन सब करें, सुख में करे न कोए।
जो सुख तें सुमिरन करें, दुख काहे को होए।।

फिर एक दिन अचानक बालकृष्ण दास मित्तल को गुर्दें की बीमारी ने अपनी जद में ले लिया तो दर्द से कराहते श्री मित्तल को पूर्व में स्वप्न में श्री साँई बाबा के शिरड़ी आने की बात याद आयी। इसी बीच श्री मित्तल का एक सड़क दुर्घटना में एक कंधा चोट आने के कारण जाम हो गया, जिससे उनका शारिरिक दुख और अधिक बढ़ गया।


फिर 30 अक्टूबर, 1979 को बाल कृष्ण दास मित्तल के साथ एक अनहोनी और घट गयी। हुआ यूँ कि जब उस दिन श्री मित्तल अपने क्लीनिक से घर जा रहे थे तो जिस बस में सवार थे उस बस के ब्रेक फेल हो जाने से बस दुर्घटनाग्रस्त होकर पलट गयी लेकिन श्री साँई बाबा ने श्री मित्तल की रक्षा करते हुए उनके ऊपर चावलों की धार बाँध दी। अन्ततः बालकृष्ण दास मित्तल अगले दिन ही साँई बाबा के दर्शन करने सपरिवार शिरड़ी को चल पड़े। फिर क्या था? श्री मित्तल के तमाम गुर्दें की पथरी, कंधे की बीमारी तेल व उदी लगाते ही ठीक हो गयी। इसके बाद उनका विश्वास श्री साँई बाबा में बढ़ गया। अन्ततः श्री मित्तल ने 19 नवम्बर, 1979 को “श्री साँई बाबा सेवा संस्थान” की स्थापना कर मन्दिर निर्माण का कार्य प्रारम्भ कर दिया।


कंकरखेड़ा थाने के सामने मार्ग पर बना “श्री साँई बाबा का मन्दिर” कई सौ वर्ग गज में बना है। इस मन्दिर के बारे में बताया जाता है कि उत्तर भारत में श्री साँई बाबा के नाम से बनने वाला यह प्रथम मन्दिर है जोकि “छोटी शिरड़ी” के नाम से प्रसिद्ध है। इस मन्दिर को भारत में प्रथम छोटी शिरड़ी होने का गौरव प्राप्त है। इस परम सिद्धि क्षेत्र में दूर-दराज से श्री साँई बाबा के भक्तजन मन्नते माँगने आते है। मान्यता है कि जो भी भक्तजन यहाँ अपनी किसी मनोकामना के लिए मन्दिर परिसर स्थित स्तम्भ पर नारियल बाँधता है वह नारियल उस भक्त की मनोकामना पूर्ण होने पर स्वयं टूटकर गिर जाता है।


मनोकामना पूर्ण हुई या नहीं इसका पता भी दो-तीन दिन में ही तब चल जाता है, जब उक्त भक्त साप्ताहिक भण्डारे का, जो प्रत्येक गुरूवार को सम्पन्न होता है। अपनी श्रद्धापूर्वक कृतज्ञता दिखाते हुए उसका आयोजन करता है। भारत के पाँच प्रदेशों में यह मन्दिर परम सिद्धि के क्षेत्र में प्रथम स्थान रखता है। दमा रोगियों के लिए प्रसाद स्वरूप उदी दी जाती है। जिससे शीघ्र स्वास्थय लाभ हो जाता है। संस्था की ओर से वर्ष में चार बार पर्व मनायें जाते है, जिनमें राम नवमीं के अवसर पर श्री साँई बाबा का जन्म दिवस, श्री गुरू पूर्णिमा पर्व, दशहर के अवसर पर महासमाधि दिवस, बसन्त पंचमी पर्व पर श्री विग्रह का स्थापना दिवस मुख्य रूप से मनाये जाते हैं। इन पर्वों पर मन्दिर में सैकड़ों श्रद्धालू श्री साँई बाबा के दर्शन कर मन्नतें माँगने आते है व भण्ड़ारों का आयोजन किया जाता है।

-साँई भक्त


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