सँत जी का जीवन परिचय

सँत जी का जन्म 3 मई 1940 को शुक्रवार के दिन वैसाख कृष्ण एकादशी के दिन सांयकाल गौ धूलि वेला में उत्तर प्रदेश के प्रख्यात नगर हापुड़ (जो पहले मेरठ जिले में था व अब गाजियाबाद जिले में है) के कबाड़ी बाजार स्थित पटवों वाली गली में हुआ था। सँत जी के पिता का नाम शिवधन मल था व माता का नाम सरती देवी था। संत जी एक प्रतिष्ठित धनवान परिवार में जन्में । Born with silver spoon in mouth वाली कहावत संत जी के जन्म के बारे में सत्य उतरती है। आपके तीन भाई व चार बहनें है। सभी बहन भाईयों ने उच्च स्तर की शिक्षा ग्रहण की व संत जी ने चिकित्सा विज्ञान मंे एम0 बी0 बी0 एस0 की डिग्री लखनऊ विश्वविद्यालय से प्राप्त की। सन् 1964 में इसी वर्ष डा साहब का विवाह राय साहब इ0श्री लक्ष्मण स्वस्प जी निवासी 189, साकेत मेरठ की परम विदूषि कन्या श्रीमति सरिता देवी से 19 जनवरी 64 को बसंत पंचमी के पावन पर्व पर सम्पन्न हुआ। सरिता देवी मनोविज्ञान में एम0 ए0 है। मेरठ काॅलिज से उन्होंने एम0 ए0 की परीक्षा में प्रथम वरीयता प्राप्त की। आप एक अत्यन्त उच्च कोटि की कुशाग्र बुद्धिमान, सुशील एवं सादा जीवन उच्च विचार वाली संभ्रात महिला है। आपका जन्म 10 मार्च 1942 को शिवाजी रोड, मेरठ में सुविख्यात “राम वाटिका” में अपने नाना जी श्री रामचन्द्र के घर में हुआ। आपके तीन भाई व दो बहनें है। पिता श्री लक्ष्मण स्वरूप जी P.W.D. U.P. में अधीक्षण अभियन्ता रहे। तथा रिटायर्ड होने के बाद कानपुर नगर निगम में मुख्य अभियन्ता रहें। आप मेरठ के एक प्रतिष्ठित जमींदार घराने के थे तथा रूड़की विश्वविद्यालय से इन्जीनियरिंग में स्नातक की डिग्री प्राप्त की थी। सँत जी का मन बचपन से ही ईश्वर की पूजा उपासना यज्ञ वगैरा में लगा रहता था व धर्म-परायण थे। परिवार धनाढ्य था तथा समाज में पिताजी एक प्रतिष्ठित व्यक्ति रहे। सँत जी के बड़े भाई हापुड़ की नगरपालिका के अध्यक्ष रहे। सँत जी ने उत्तर रेलवे में डाॅ0 की हैसियत से नौकरी भी की पर स्वभाव से स्वाधीन व स्वछन्द विचारों का होने के नाते 4 वर्ष के बाद त्यागपत्र दे दिया व अपनी प्रैक्टिस शुरू कर दी। सँत जी की दो पुत्रियाँ व एक पुत्र हैं। सन् 1972 में संत जी अलौकिक रूप से श्री सत्य साँई बाबा जी के चरणों की सेवा में तन-मन-धन से जुड़ गये। सन् 1979 में 19 नवंबर की शाम को सोमवार के दिन भजन करने के बाद शिरडी साँई बाबा की प्रेरणा व आर्शिवाद से साँई बाबा का मेरठ में मन्दिर बनाने की इच्छा ने संत जी के मन में जन्म लिया व उसी क्षण इच्छा ने जन्म लेकर तुरन्त कार्य रूप में परिणित होने की ठान ली। शनैः शनैः बाबा का भवन बनना शुरू हो गया व सन् 1982 में बसन्त पँचमी के शुभ अवसर पर श्री साँई बाबा स्वयं मन्दिर में आ गये। 1996 में गुरू पूर्णिमा के दो दिन पूर्व 28 जुलाई को बाबा अपनी धुनी मन्दिर में ले आये शिरडी से व स्थाई रूप से स्थापित कर दी। सन् 1997 को जुलाई में बाबा ने बच्चों की एक पाठशाला स्थापित कर दी जो सुचारू रूप से शिक्षा प्रदान कर रही हैपर पाच वर्ष बाद यह बन्द कर दी गई। सँत जी शिरडी वाले साँई बाबा जी के बारे में 13 नवम्बर, 1979 से पहले ज्यादा अधिक नहीं जानते थे पर 13 नवम्बर की रात को बाबा ने स्वयं स्वप्न में सँत जी को दर्शन दिये, समाधि पर प्रसाद दिया व आकाशवाणी हुई कि शिरडी में जो दिया जल रहा है उसका तेल लगा लो स्वस्थ हो जाओगे। सँत जी सपरिवार शिरडी यात्रा पर निकल पडे। सँत जी गुर्दे की पथरी व कई माह से पेचिश से ग्रसित थे तथा 1-2 दिन पहले ही बस पलट जाने के कारण सँत जी शिरडी पहुँचे व पहले द्वारिका माँई में जाकर बाबा को नमस्कार कर एक दिये में से तेल लेकर अपने कन्धे को ज्यों ही लगाया उसी क्षण जाम पडा हाथ उपर उठ गया व सही रूप से कार्य करने लगा व फिर सँत जी ने अपने उदर पर नाभि के चारों तरफ बाबा की उदी लगाई। अगले दिन बाबा की कृपा से गुर्दे की पथरी अपने आप बाहर निकल गई व पेचिश तो शिरडी पहुँचते-पहुँचते ही ठीक हो गई थी। सँत जी को बचपन से ही भगवान की कृपा प्राप्त रही है। 15-16 वर्ष की अवस्था में भगवान शंकर व माँ भगवती ने दर्शन दिये तथा माँ ने सँत जी के कान में दिव्य मन्त्र फूँक दिया। दिल्ली में प्राचीन लोहे के पुल के पास जमुना के किनारे पाण्डवों द्वारा निर्मित नीली छतरी वाले शिव मन्दिर में रविवार की प्रातः वेला तथा में 33-34 वर्ष की अवस्था में माँ ने फिर वैष्णव देवी के रूप में अपने साक्षात दर्शन दिये। माँ चण्डी ने सँत जी से कई बार दर्शन देकर मुँह दर मुँह बात की व हार आदि सँत जी के गले में डाल दियें। सँत जी पहले जन्म में मथुरा में थे व ब्राहमण परिवार से थे। सँत जी को पूर्व जन्म के प्रसाद के रूप में ज्योतिष व हस्तरेखा शास्त्र का ज्ञान इस जन्म में भी है जिससे हजारों श्रद्धालुओं को लाभ होता रहता है। भगवान बाबा की सँत जी पर असीम कृपा है व बाबा सँत जी से अत्यधिक स्नेह रखते है। सँत जी के बच्चों के विवाह में बाबा स्वयं उपस्थित रहे व सभी माँगलिक कार्य सुन्दर ढंग से सम्पन्न हुए। सँत जी वैश्य वर्ण की बीसा अग्रवाल जाति के मिततल गोत्र में उत्पन्न हुए। संसार में सँत जी सरीखी वैश्य समाज में गृहस्थ सँत बहुत कम हुए है। श्री साँई बाबा के जीवन काल में श्री जानकी दास नाम के वैश्य सँत हुए जो वर्षो तक बाबा के चरणों की छाया में रहे व बाबा की कृपा प्राप्त की। सँत जी अपने को सँत जानकी दास जी का ही अवतार मानते है। सँत जी को धनाढ्यता के बीच कभी भी धन के प्रति आसक्ति नहीं रही विद्यावान होते हुए भी कभी कीर्ति की इच्छा नहीं है तथा इतने बड़े समाज से जुड़े रहने के बावजूद सँत जी सभी स्त्रियों को बहन बेटी के रूप में व पुरूषों को भाई व बेटे के रूप में देखते है। मूलतः सँत जी हरियाणा प्रान्त में रोहतक जिले के गोहाना तहसील में रिवाडा ग्राम की भाषा में बात करते है तथा original mother tongue हरियाणवी है। वेशभूषा सामान्य आदमी जैसी धारण करते है। कोई आडम्बर नहीं, कोई दिखावा नहीं। आजकल सँत जी का ज्यादातर समय बाबा की सेवा में ही व्यतीत होता हैं। 73 वर्ष की अवस्था में भी कोई आलस्य नहीं, कोई विश्राम नहीं, ना प्रसाद और ना ही निद्रा की वशीभूतता, दूसरों की पीडा समझने की आलौकिक शक्ति है। सँत जी समयानुसार मोम की तरह मुलायम व पत्थर की तरह सख्त है। सँत जी के जीवन में मनसा वाचा कर्मणा सत्यता की पूरी-पूरी छाप है।


दादा   वैशावली नाना
श्री चरण सुखदास   रिवाडा श्री हरनारायण दास
पर पर दादा   (परनाना)
श्री रूपचन्द पर दादा   रिवाडा श्री खुबी राम (नाना)
श्री गणेशी लाल दादा   रिवाडा श्रीमति सरती देवी (माँ)
श्री शिवधन मल पिता   रिवाडा
श्री डाॅ0 बाल कृष्ण दास   हापुड़
श्री विश्वास मित्तल पुत्र   मेरठ
श्री अमित मित्तल पौत्र   मेरठ


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